...की मृत्यु पर

ki mirtyu par

दूधनाथ सिंह

दूधनाथ सिंह

...की मृत्यु पर

दूधनाथ सिंह

और अधिकदूधनाथ सिंह

    इस तरह खो देने के बाद कितनी सघन छाया होती है तुम्हारी

    कि मैं समुद्रों पर चलता हूँ और शब्द लाता हूँ—

    तुम्हें फिर-फिर आविष्कृत करने को।

    असंख्य बुलबुलों में रात फूटती है : तुम्हारे अधर हिलते हैं

    चिनारों के वन दिखते हैं, बर्फ़ गिरती है, आग लगती है।

    तुम्हारी एक दबी हुई बाँह करवट की सुविधा माँगती है,

    अनंत-काल में कवि-मुख... अनंत-काल की

    सहस्र-मणि-व्यथाएँ

    अंधकार में चमकती हैं।

    मुझसे अपघात होता है। संध्याएँ स्वप्न-परिधि में सो जाती हैं

    आग की लपटें तौलता हूँ, इशारों में... फिर नसें फटती हैं,

    अँतड़ियों में टूट रहे गीतों में, सारी प्रकृति में झरता रहता है

    तुम्हारे चेहरे का अजस्र संगीत। डूबा हुआ... बेहोश... मैं

    फिर-फिर अँधेरे समुद्र से लाता हूँ शब्द

    तुम्हें आविष्कृत करने को।

    तुम आविष्कृत होती हो : एक दर्पण में

    मेरी ही आँखें एकटक देखती हैं मुझे

    तुम आविष्कृत होती हो : मैं प्रकृति की माँग में सिंदूर भरता हूँ,

    तुम आविष्कृत होती हो : एक मिट्टी की मूरत आलिंगन-बद्ध होती है

    ...की मृत्यु पर

    सूखे फूलों के गजरों में पतझर फैलता है

    और मैं एक-एक पँखुरी

    एकत्र करने में संलग्न

    तुम आविष्कृत होती हो : भयावह तूफ़ान का शोर घरघराता है

    मैं एक-एक पँखुरी का पतझर वक्ष में दबाए, अपने प्राण बोता हूँ—

    घसीटता हूँ—पर्वतों, नदियों, नगरों, सड़कों और मशीनों के जबड़ों में।

    ख़ून बहता है... लगातार आँखों से ख़ून बहता है,

    टप...टप टपकती है सुबह

    तुम्हें इस तरह खो देने के बाद।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अपनी सदी के नाम (पृष्ठ 48)
    • रचनाकार : दूधनाथ सिंह
    • प्रकाशन : साहित्य भंडार
    • संस्करण : 2014

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