अँधेरे में बुद्ध

गगन गिल

अँधेरे में बुद्ध

गगन गिल

और अधिकगगन गिल

    अँधेरे में बुद्ध

    अपनी प्रतिमा से निकलते हैं

    अपनी काया से निकलते हैं

    अपने स्तूप से निकलते हैं

    अस्थि-पुंज से निकलते हैं

    अँधेरे में बुद्ध

    परिक्रमा करते हैं

    माया की

    मोक्ष की

    पृथ्वी की

    काँटे की नोंक पर

    ठिठकते हैं

    अँधेरे में बुद्ध

    दुख उनके लिए है

    जो उसे मानते हैं

    दुख उनके लिए भी है

    जो उसे नहीं मानते हैं

    सिर नवाते हैं

    अँधेरे में बुद्ध

    अगरबत्ती जलाते हैं

    सामने उसके

    जो है

    जो नहीं है

    एक मुद्रा से दूसरी मुद्रा तक

    एक प्रतिमा से दूसरी प्रतिमा तक

    अँधेरे में बुद्ध

    अपनी जगह बदलते हैं

    जैसे उनकी नहीं

    दुख की जगह हो

    स्रोत :
    • पुस्तक : अँधेरे में बुद्ध (पृष्ठ 115)
    • रचनाकार : गगन गिल
    • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
    • संस्करण : 1996

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