आइसक्रीम

ऋतुराज

आइसक्रीम

ऋतुराज

और अधिकऋतुराज

    एक दुपहर जब रोहिणी ख़ूब तप रही थी

    हाँफ रही थी चिड़ियाँ

    मीठे ठंडे पानी की कुंई

    सोई थी पीपल के चरणों में

    बिना रस्सी बाल्टी के

    तब जाने किस क़स्बे के ऊँघते बाज़ार से

    वे अपने गाँव लौट रहे थे—

    साइकिल के अगले पहिए की ओट में

    बैठ गई थी औरत

    उसका सुनहरा दीप्त चेहरा

    सूर्य-किरणों जैसी पहिए की तानों से दिखाई दे रहा था

    आदमी ने थैली में से निकालीं दो आइसक्रीमें

    काग़ज़ में लिपटीं जिनसे बह रहा था लाल शरबत

    अनिर्वचनीय सुख में दोनों कुछ देर खो गए थे

    भूल गए थे कि तपती दुपहर में लंबी यात्रा है अधूरी

    वे चाहते तो बाज़ार में ही खा डालते ये आइसक्रीमें

    लेकिन तब इतनी निर्भयता नहीं होती

    तिक्तता कंठ की जस की तस रह जाती

    इस औरत के होंठ नहीं रँगे होते

    धीरे-धीरे लाल-लाल

    आइसक्रीमें ख़त्म हो जाने के बाद

    वह ऐसी दिखाई दे रही थी

    जैसे कि उसे साइकिल की ओट में

    बहुत चूमा हो पति ने

    सारी दुपहर पीपल की छाया

    और ठंडी कुंई की साक्षी में

    स्रोत :
    • पुस्तक : आशा नाम नदी (पृष्ठ 60)
    • रचनाकार : ऋतुराज
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 2007

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