आधुनिक नाटक और नाट्यशाला

कमलाकांत मिश्र

आधुनिक नाटक और नाट्यशाला

कमलाकांत मिश्र

और अधिककमलाकांत मिश्र

    नाटक शब्द नट् धातु से बना है। नट नाचने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। अँग्रज़ी में नाटक को ड्रामा कहते हैं। ड्रामा के लिए संस्कृत में नाटक  की अपेक्षा रूपक शब्द अधिक उपयुक्त है। ड्रामा का मूल शब्द इसी अर्थ का द्योतक है। ड्रामा उन रचनाओं को कहते हैं जिनमें अन्य लोगों के क्रियाकलापों का अनुकरण इस प्रकार किया जाता है कि मानो वही काम कर रहे हों। जूलियस सीज़र के नाटक में कोई व्यक्ति इसका इस प्रकार अनुकरण करता है कि मानो वही जूलियस सीज़र है। दूसरों का अनुकरण करना मनुष्य मात्र का स्वभाव है। बालक अपने माता-पिता का अनुकरण करता है। छोटे लोग बड़ों का अनुकरण करते हैं। नाटकों  की उत्पत्ति मनुष्यों के स्वभाव से ही हुई है। एक बात और है। नाटक में सिर्फ़ क्रियाकलापों का ही अनुकरण नहीं होता। मनुष्यों की हृद्गत भावनाओं का भी अनुकरण किया जाता है। यह तभी संभव है जब हम दूसरों के सुख-दुख को अपना सुख-दुख समझ लें। यही सहानुभूति है। यह भाव भी स्वाभाविक है। सच पूछा जाए तो इसी के आधार पर मानव समाज स्थित है। यदि यह न रहे तो मानव समाज छिन्न-भिन्न हो जाए। अस्तु, हमारे कहने का तात्पर्य यही है कि नाटकों का मूल रूप मनुष्यों के अंतर्जगत में विद्यमान है। बाह्यजगत में उसका विकास क्रमशः हुआ है। 

    नाटक में नट दूसरे के कार्यों का अनुकरण करता है। इसी को अभिनय कहते हैं। यह कला है। भावों के आविष्करण को कला कहते हैं। किसी भी कला में नैपुण्य प्राप्त करने के लिए विशेष योग्यता  की ज़रूरत है। इसीलिए पद्यपि अनुकरण करने  की प्रवृत्ति सभी में होती है तथापि नाट्यकला में दक्ष होना सब के लिए संभव नहीं है।

    नाटक और नाट्यकला में परस्पर संबंध है। नाटक के लिए नाट्यकला आवश्यक है। परंतु नाटक स्वयं एक कला है और उसकी उत्पत्ति मनुष्यों के अंतःकरण में होती है। बाह्य जगत् में उसको प्रत्यक्ष कर दिखाना नाट्यकला का काम है। नाटकों  की गणना काव्यों में की जाती है। उन्हें दृश्य काव्य कहते हैं, अर्थात् ये वे काव्य हैं जिनमें हम कवि  की कुशलता का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। यद्यपि रंगभूमि में कवि नहीं आता तथापि नटों के द्वारा हम उसी की वाणी सुनते हैं। नाट्यशाला शरीर है और कवि उसकी आत्मा है।

    इंग्लैंड में नाटकों का प्राचीनतम रूप हमें वहाँ के मिस्ट्री (Mystery) और मिराकिल (Miracle) नाटकों में मिलता है। इन नाटकों का विषय धार्मिक था। बाइबिल अथवा किसी महात्मा की दंतकथाओं के आधार पर इनकी रचना होती थी। भारतवर्ष में इन्हीं के जोड़ के नाटक ताड़-पत्र पर लिखे हुए पाए गए हैं। इन नाटकों के रचयिता महाकवि अश्वघोष माने गए हैं। इनमें बुद्धि, धृति, कीर्ति आदि सद्गुणों को और बुद्ध, मौद्गलायन, कौण्डिन्य आदि महात्माओं को रंगभूमि में अवतीर्ण होना पड़ा है। इंग्लैंड में ऐसे नाटकों में हास्यरस का भी समावेश किया गया है। इन्हीं के आधार पर आधुनिक नाटकों की रचना हुई है अथवा यह कहना चाहिए कि इनसे ही आधुनिक नाटकों का विकास हुआ। सन् 1560 से सन् 1580 तक नाटकों का शैशवकाल था। इस समय जो नाटक बने वे प्रायः एक ही साँचे में ढले रहते थे। सन् 1576 से नाटक नाट्यशाला में खेले जाने लगे। सन् 1574 में अर्ल ऑफ़ लीस्टर के नौकरों को इंग्लैंड के सभी नगरों में नाटक खेलने का अधिकार मिल गया और 1576 में उन्होंने ब्लैक-फ्रायर्स थिएटर (BlackfriarsTheatre) की स्थापना की। सन् 1580 से सन् 1596 तक नाटक और नाट्यशालाओं की उन्नति बराबर होती रही। इस काल के नाटककारों में लिली, पील, ग्रीन, लाज, मारलो आदि थे। इंग्लैंड के जगद्विख्यात नाटककार शेक्सपियर का भी आविर्भाव हो गया था। शेक्सपियर ने नाटकों को उन्नति की चरम सीमा तक पहुँचा दिया। शेक्सपियर सिर्फ़ नाटककार ही नहीं था, वह नट भी था। इसलिए नाट्यकला में भी अच्छी उन्नति हुई। सन् 1599 में ग्लोब थिएटर स्थापित हुआ। उस समय के थिएटरों और आजकल के थिएटरों में आकाश पाताल का भेद पड़ गया है। आजकल तो रंगभूमि में सभी तरह के दृश्य दिखलाए जा सकते हैं। पर तब कहाँ ऐसे दृश्य और ऐसे पर्दे थे। दर्शकों को नाटक के अधिकांश दृश्य अपनी कल्पना से ही देखने पड़ते थे। शेक्सपियर के बाद नाटकों  की अवनति होने लगी। चार्ल्स प्रथम के समय में जब इंग्लैंड में राज्य-विप्लव हुआ तब नाटक और नाट्यकला पर बड़ा आघात पहुँचा। थिएटर तो सभी बंद हो गए। उस समय लोग ऐसे आमोद-प्रमोदों को चरित्र-दूषक समझते थे। इसके बाद चार्ल्स द्वितीय का ज़माना आया। नाटक में तत्कालीन समाज के अनाचार ने प्रवेश किया। इसी समय पहले-पहल रंगमंच पर नटियाँ आईं। इस समय इंग्लैंड के नाट्य-साहित्य पर फ़्रांस के नाटककारों का ख़ूब प्रभाव पड़ा। कार्नील, रेशीन और मालियर के नाटकों के अनुवाद, छायानुवाद, भावानुवाद आदि ख़ूब निकले। ड्राइडन नामक कवि ने अवश्य अँग्रेज़ी नाटकों में मौलिकता पैदा  की। इस बाद जितने नाटककार हुए, उनमें गोल्डस्मिथ और शेरीडन ने ख्याति प्राप्त की। इनके बाद अँग्रेज़ी के आधुनिक नाट्य-साहित्य का आरंभ होता है।

    उन्नीसवीं सदी के आरंभ में नेपोलियन का पतन होने पर इंग्लैंड  की प्रभुता अच्छी तरह स्थापित हो गई। इसके बाद उसने अपने व्यवसाय और वाणिज्य में बड़ी तरक्की की। व्यापार का केंद्रस्थल है नगर। इसलिए नगरों  की जनसंख्या ख़ूब बढ़ने लगी। 

    नगरों में जनसंख्या की वृद्धि के साथ ही साथ नाट्यशालाओं की वृद्धि होने लगी। अभी तक नाटकघर सिर्फ़ मनोरंजन के स्थान थे। वहाँ प्रायः ऐसे धनिक ही जाया करते थे जो निठल्ले बैठे समय काटा करते थे, परंतु अब नगर में रहने वाले साधारण स्थिति के लोग और मज़दूर भी नाटकघर जाने लगे। दिन भर काम करने के बाद घड़ी आाध घड़ी यदि मनुष्य अपना मन न बहलावे तो उसका शरीर कैसे टिक सकता है। मन बहलाने का सब से अच्छा स्थान नगरों में नाटकघर ही हैं। इसीलिए उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में नाटक और नाट्यकला की ख़ूब उनति हुई।

    आधुनिक नाट्य-साहित्य के पहले मौलिक नाटककार टी० डबल्यू० रॉबर्टसन् ( 1829-1871) थे। उनके नाटक प्रिंस ऑफ़ वेल्स थिएटर में खेले जाते थे। अँग्रेज़ी में नाटकों के दो भेद हैं—कॉमेडी और ट्रेजडी। रॉबर्टसन् ने कॉमेडी नाटकों के पुनरुत्थान की चेष्टा की। प्रिंस ऑफ़ वेल्स थिएटर के अध्यक्ष थे बैनक्राफ़्ट साहब। उन्होंने नाट्यशाला में स्वाभाविकता लाने का प्रयत्न किया। बैनक्राफ़्ट का जन्म सन् 1841 में हुआ था। सन् 1865 में उसने प्रिंस ऑफ़ वेल्स थिएटर की स्थापना की। उसने नाट्यकला की कायापलट कर दी। 1897 में उसे ‘सर’ की उपाधि मिली।

    इसी समय लीसियम (Lyceum) थिएटर में इंग्लैंड का प्रसिद्ध नट हेनरी इरविंग रंगमंच पर आया। वह सन् 1878 से 1899 तक लीसियम का प्रबंध करता रहा। उसकी बड़ी कीर्ति हुई। सन् 1874 में ‘हैमलेट’ का पार्ट उसने बड़ी ख़ूबी से खेला। शेक्सपियर के प्रसिद्ध ‘मर्चेंट ऑफ़ वेनिस’ में वह शाइलॉक का पार्ट लेता था। इसमें भी वह कमाल करता था। उसने नटों की अच्छी स्थिति कर दी। उसके पहले लोग नटों का सम्मान नहीं करते थे। उनका पेशा भी नीच समझा जाता था। पर इरविंग  की सब लोगों ने इज्ज़त  की। सन् 1895 में वह नाइट बनाया गया। नटों में सबसे पहले उसी को यह उपाधि मिली।

    इस समय इंग्लैंड में अच्छे-अच्छे कवि हुए। उन्होंने नाटक भी लिखे। परंतु उनके नाटकों को रंगभूमि पर अच्छी सफलता नहीं हुई। मैकरेडी ने प्रसिद्ध कवि ब्राउनिंग के ‘स्टेफ़ोर्ड’ नामक नाटक के लिए बड़ी तैयारी की। पर वह पाँच रात से अधिक नहीं चला। टेनीसन के ‘दी कप’ और ‘बेकट’ नामक नाटकों को इरविंग ने खेला। पर उसे भी कुछ सफलता नहीं हुई। इसलिए फ्रेंच नाटकों के ही आधार पर अँग्रेज़ी में नाटक खेले जाते थे। सन् 1881 में ए० डबल्यू० पिनरो साहब का नाटक खेला गया। उसका कुछ आदर हुआ। फिर तो उसके कई नाटक खेले गए और सभी में उसे सफलता प्राप्त हुई। नाट्य-साहित्य में उसका अच्छा स्थान हो गया।

    अब हम एक बार तत्कालीन नाट्यशालाओं पर भी दृष्टि डालें। यह तो हम कह आए हैं कि बैनक्राफ़्ट ने नाट्यशाला की अच्छी उन्नति की थी। उसने दर्शकों के लिए नाटकघर को सभी तरह से मनमोहक कर दिया था। हाफ़ गिनी-स्टाल खोल देने से बड़े-बड़े लोग भी थिएटर में आने लगे। नाट्यशालाओं का आदर होते देख अच्छे कुल के पढ़े-लिखे लोग भी अभिनय करने लगे। गत पचीस वर्षों से नाव्यशाला सभ्यता का एक प्रधान अंग हो गई है। जो लोग नाट्यशाला को अपनी जीविका का द्वार समझते हैं, वे तो अभिनय करते ही हैं; जो श्रीमान् हैं, प्रतिष्ठित हैं, कुलीन हैं, वे भी अपने मनोविनोद के लिए अभिनय किया करते हैं। कई अर्ल, काउंटेस, मारक्विस आदि संभ्रांत स्त्री-पुरुषों ने अभिनय कला में अच्छी पारदर्शिता दिखलाई है।

    इंग्लैंड के राजपरिवार में भी दो एक ऐसे हैं जो अभिनय कला में निपुण हैं। प्रिंसेस लुई, डचेज़ ऑफ़ आरगाइल में उच्चकोटि  की अभिनय-योग्यता है। अर्ल ऑफ़ यारमाउथ ने तो अमरीका में जाकर अभिनय किया था। काउंटेस ऑफ़ वेस्ट मूरलैंड भी अच्छी अभिनेत्री हैं।

    नाटकों में ऐसे-ऐसे लोगों के योग देने से वहाँ अब कुछ दूसरी ही छटा आ गई है। भव्य भवन, विशाल रंगभूमि, आह्लादकारक संगीत, आश्चर्यजनक दृश्य और चित्ताकर्षक अभिनय। सच तो यह है कि यूरोप की विलासिता उसके नाटक-घरों में ही अच्छी तरह ज्ञात हो जाती है, दर्शकों के आराम के लिए सभी तरह  की सुविधाएँ रहती हैं।

    इधर नाट्यकला का रूप पलटा, उधर नाटकों के आदर्श भी बदले। नाट्य-साहित्य में हलचल पैदा कर देने बाले हेनरिक इब्सन का जन्म सन् 1828 में हुआ था। उसने रंगभूमि पर मनुष्यों के अंधकारमय जीवन का दृश्य दिखलाया। जर्मनी और फ़्रांस में उसके नाटक पहले ही खेले जा चुके थे। पर इंग्लैंड में सन् 1889 में उसका नाटक पहले-पहल खेला गया। तब उसके नाटकों की बड़ी तीव्र आलोचनाएँ हुई। परंतु उसका सिक्का जम ही गया। इंग्लैंड के वर्तमान नाटककार बर्नार्ड शॉ इब्सन के ही अनुयायी हैं।

    शॉ की माता ने एक आइरिश नाट्यशाला में कुछ समय तक काम किया था। इसलिए शॉ को बाल्यकाल में ही संगीत और नाट्यकला से प्रेम हो गया। 20 वर्ष की अवस्था में वह लंदन आया। उस समय इंग्लैंड के सामाजिक जीवन पर रस्किन और विलियम मॉरिस का ख़ूब प्रभाव था। सभी कला-कोविद समाज-सुधारक हो गए थे। सर्वत्र 'सौंदर्य' और 'सरल जीवन'  की चर्चा हो रही थी। शॉ ने भी समाज-सुधार को अपने जीवन का प्रधान उद्देश्य समझा। सबसे पहले उसने व्याख्यान देने का अभ्यास किया। इससे उसको यह लाभ हुआ कि उसके गद्य  की शैली निश्चित हो गई। सन् 1885 में शॉ ने सामयिक पत्रों में लेख देना आरंभ किया। 'वर्ल्ड', 'स्टार' और 'सैटरडे रिव्यू' में वह संगीत-कला और नाटकों की समालोचना किया करता था। उसका कथन है—नाट्यशाला का वही महत्त्व है जो मध्ययुग में चर्च का था। वह विचारों को उत्पन्न करती है, विवेक को स्फूर्ति देती है, आचरण को विशद करती है, निराशा और उत्साहहीनता को दूर करती है और मनुष्यों को उन्नति का पथ बतलाती है। 1878 में उसने नाटक लिखना आरंभ किया। इसी साल उसका 'Plays Pleasant and Unpleasant' नामक ग्रंथ प्रकाशित हुआ। उससे लोगों में बड़ी उत्तेजना फैली। उसका एक नाटक 'Mrs. Warren's Profession' रंगस्थल के अयोग्य ठहराया गया। शॉ को सब दुर्गुणों से घृणा थी। परंतु वह यह चाहता था कि समाज अपने दुर्गुण देख ले, तभी वह अपना सुधार कर सकता है। परंतु समाज अपने दुर्गुणों का प्रदर्शन नहीं चाहता था। वह चाहता था सिर्फ़ मनोविनोद। इसलिए शॉ ने अपने नाटकों में मनोरंजन  की काफ़ी सामग्री रक्खी। 'Man and Superman' में उसने लिखा है—“मुझे अपने नाटक को चित्ताकर्षक बनाना होगा, पर सिर्फ़' मनोरंजन के लिए मैं एक भी वाक्य लिखने का श्रम नहीं उठाऊँगा। आजकल तो बनार्ड शॉ की बड़ी ख्याति है।

    ऑस्कर वाइल्ड को भी पहले-पहल अपने सभी नाटकों के लिए बड़ा दुःख भोगना पड़ा। उसके सभी नाटकों  की निंदा हुई। परंतु रंगभूमि पर सभी नाटक सफलतापूर्वक खेले गए। उस समय लोगों को प्रशंसा करनी ही पड़ी। पर बाद को लोगों ने उस पर कठोर आक्षेप किए। सन् 1892 में पैलेस थिएटर में उसके एक नाटक ‘Salome’ का रिहर्सल हो रहा था। तब सेंसर (Censor) ने उसे बंद करा दिया। जब वह सन् 1893 में प्रकाशित हुआ, तब उसकी बड़ी कड़ी आलोचना हुई। सन् 1896 में जब वाइल्ड क़ैद में था, उसका सलोम नामक नाटक पेरिस में बड़ी सफलता से खेला गया। सन् 1901 में बर्लिन में उसका अभिनय हुआ, तब से योरप की रंगभूमि में उसके नाटक बराबर खेले जा रहे हैं। अब तो अमरीका और एशिया में भी उनका प्रचार हो रहा है। इंग्लैंड में सत् 1905 में न्यू स्टेज क्लब ने उसके इसी नाटक को खेला। तब दर्शकों ने उसे बड़े ध्यान से देखा।

    योरप के नाट्य-साहित्य पर बेल्जियम के विख्यात कवि मॉरिस मैटरलिंक के नाटकों का भी ख़ूब प्रभाव पड़ रहा है। इनका कुछ निराला ही रंग है। इन्होंने मनुष्यों की आध्यात्मिकता पर अधिक ज़ोर दिया है। इनका जन्म सन् 1862 में हुआ था। सन् 1890 से इनकी  कीर्ति फैलने लगी। सन् 1891 में इनका एक एकांक नाटक खेला गया। सन् 1896 में इनका पेलीयास और मेलीसांडा नाम का नाटक अभिनीत हुआ।

    आधुनिक नाटककारों में डबल्यू०बी० येट्स का भी अच्छा नाम है। सन् 1892 में इनके ‘The Countess of Kathleen’ का अभिनय हुआ और 1864 में ‘The Land of the Heart's Desire’ का। भारतवर्ष के कवि-सम्राट रवीन्द्रनाथ ठाकुर के भी नाटकों का अभिनय इंग्लैंड में होने लगा है। गत 4 मई सन् 1920 को प्रिंस ऑफ़ वेल्स थिएटर में उनके चित्रा और सैक्रिफ़ाइस (Sacrifice) नामक नाटकों का अभिनय हुआ था।

    नाटक दृश्य काव्य है। अतएव उत्तम नाटक वही कहे जा सकते हैं जो रंगभूमि पर अच्छी तरह खेले जा सकें। परंतु अब आधुनिक साहित्य में नाटकों के दो भेद कर दिए गए है। कुछ नाटक तो खेले जाने ही के लिए लिखे जाते हैं, परंतु कुछ ऐसे भी नाटक होते हैं जो श्राव्य काव्य कहे जाते हैं। अँग्रेज़ी में उन्हें Poetic Drama कहते हैं। ऐसे नाटकों में नाटकों के अन्य सभी गुण रहते हैं, परंतु उनमें वह विशेषता नहीं रहती जिससे नाटक रंगमंच पर सफलतापूर्वक खेले जा सकें। टेनीसन के नाटक इसी कोटि के हैं। भवभूति के नाटकों में भी कवित्व की छटा अधिक है। इन्हें पढ़ने से जो आनंद होता है, वह देखने से नहीं होता। यहाँ हम काव्य की दृष्टि से भी नाटकों पर कुछ विचार करना चाहते हैं।

    नाटक का प्रधान अंग है चरित्र-चित्रण और व्यक्तित्व-प्रदर्शन। नाटकों में कवि का मुख्य उद्देश्य यह रहता है कि वह मानव जीवन के रहस्य का उद्घाटन कर उसे शब्दों द्वारा स्पष्ट कर दे। परंतु यह विशेषता सिर्फ़ नाटकों में ही नहीं पाई जाती।

    महाकाव्य, नाटक और उपन्यास तीनों में ही मानव चरित्र का चित्रण रहता है। पर इनमें परस्पर बड़ा भेद है। महाकाव्य में एक अथवा एक से अधिक मनुष्यों के चरित्र वर्णित होते हैं, परंतु उन में चरित्र-चित्रण गौण रहता है। वर्णन ही कवि का मुख्य लक्ष्य होता है। ‘अज-विलाप’ में इंदुमती की मृत्यु उपलक्ष मात्र है। यह विलाप जैसे अज के लिए है, वैसे ही अन्य किसी भी प्रेमिक के लिए उपयुक्त हो सकता है। प्रियजन के वियोग से जो व्यथा होती है उसी का वर्णन करना कवि का उद्देश्य था। इंदुमती की मृत्यु के उपलक्ष में कवि ने उसी का वर्णन कर दिया। उपन्यास में मनोहर कथा की रचना पर कवि का ध्यान अधिक रहता है। गल्प की मनोहरता उसकी विचित्रता पर निर्भर रहती है। नाटक में महाकाव्य और उपन्यास दोनों  की विशेषताएँ रहती हैं। उसमें कवित्व भी होना चाहिए और मनोहरता भी। इसके लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। सबसे पहला नियम यह है कि इसमें आख्यानवस्तु की एकता हो। नाटक का वर्णनीय विषय एक होना चाहिए। इसी को परिस्फुट करने के लिए उसमें अन्य घटनाओं का समावेश किया जाना चाहिए। यदि नाटक का मुख्य विषय प्रेम है तो प्रेम के परिणाम में ही उसका अंत होना चाहिए। दूसरा नियम यह है कि उसकी प्रत्येक घटना सार्थक रहे। वे घटनाएँ नाटक की मुख्य घटना के चाहे प्रतिकूल हों अथवा अनुकूल, परंतु उससे उनका संबंध अवश्य रहना चाहिए।

    नाटकों में अलौकिक घटनाओं का भी वर्णन रहता है। जो लोग नाटकों में स्वाभाविकता देखना चाहते हैं, उन्हें कदाचित् अलौकिक घटनाओं का समावेश रुचिकर न होगा। आधुनिक नाटककार इब्सन ने अपने नाटकों में अलौकिक घटनाओं को स्थान नहीं दिया है। प्राचीन हिंदू-नाटकों में अलौकिक घटनाएँ वर्णित हैं। उदाहरण के लिए, कालिदास का ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ ही लीजिए। उसमें दुर्वासा के शाप से दुष्यंत का स्मृति-भ्रम, शकुंतला का अंतर्धान, दुष्यंत का स्वर्गारोहण—सभी अलौकिक घटनाएँ हैं। शेक्सपियर के नाटकों में भी प्रेतात्मा का दर्शन कराया जाता है। हिंदूमात्र का यह विश्वास है कि मानव जीवन में एक अष्ट-शक्ति काम कर रही है। इसी शक्ति का महत्त्व बतलाने के लिए अलौकिक घटनाओं का समावेश किया जाता है। शेक्सपियर भी यह अष्ट-शक्ति मानता था। उसने भी कहा है—There is a tide in the affairs of men, अर्थात् मनुष्यों के जीवन में कभी एक ऐसी लहर उठती है जो उन्हें सफलता के सिरे पर पहुँचा देती है और निष्फलता के खंदक में गिरा देती है। दूसरी बात यह है कि नाटकों में तत्कालीन समाज का चित्र अंकित रहता है। लोगों का जो प्रचलित विश्वास है, उसका समावेश नाटकों में करना अनुचित नहीं। शेक्सपियर के समय में लोग प्रेतों के अस्तित्व पर विश्वास करते थे। उसी प्रकार, कालिदास के समय में मुनियों के शाप पर लोगों का विश्वास था। अतएव जो नाटकों में यथार्थ चित्रण के पक्षपाती हैं, उनके लिए भी ऐसी घटनाओं का समावेश अस्वाभाविक नहीं हो सकता।

    नाटक  की एक विशेषता और है। उसमें घटनाओं का घात-प्रतिघात सदैव होता रहता है। नाटकीय मुख्य चरित्र की गति सदैव वक्र रहती है। जीवन का स्रोत एक ओर बहता है। धक्का खाते ही उसकी गति दूसरी ओर पलट जाती है। फिर धक्का लगने पर वह तीसरी ओर बहने लगता है। नाटक में मानव जीवन का यही रूप दिखलाना पड़ता है।

    उच्च श्रेणी के नाटकों में अंतर्द्वंद्व दिखलाया जाता है। मनुष्यों के अंतःकरण में सदा दो परस्पर-विरोधिनी प्रवृत्तियों के बीच युद्ध छिड़ा रहता है। यह बात नहीं कि सदा धर्म और अधर्म अथवा पाप और पुण्य में ही युद्ध होता हो, कभी-कभी सत्प्रवृत्तियाँ भी एक दूसरे का विरोध करने लगती हैं। भवभूति के उत्तर रामचरित में रामचंद्र के दृश्य में दो सत्प्रवृत्तियों का ही अंतर्द्वंद्व प्रदर्शित किया गया है। एक ओर राजा का कर्तव्य है और दूसरी ओर पति का कर्तव्य। आधुनिक नाट्य-साहित्य में इब्सन के एक नाटक ‘An Enemy of the people’ में एक मनुष्य संसार की कल्याण-कामना से संसार ही के विरुद्ध लड़ा है।

    पाश्चात्य नाटकों के दो विभाग किए गए हैं—ट्रेजडी और कॉमेडी। ट्रेजडी दुःखांत नाटक को कहते हैं और कॉमेडी सुखांत को। प्राचीन हिंदू-साहित्य में दुःखांत नाटक एक भी नहीं है। हिंदू नाट्यशास्त्र के आचार्यों की आज्ञा थी कि नाटकों का अंत दुःख में नहीं होना चाहिए। यदि नायक पुण्यवान है तो पुण्य का परिणाम दुःख नहीं हो सकता। पुण्य की जय और पाप का पराजय ही दिखलाना चाहिए। अधर्म की जय दिखलाने से डर रहता है कि लोगों पर उसका बुरा प्रभाव न पड़े, कहीं वे अधार्मिक न हो जाए। हम इस नियम को अच्छा नहीं समझते। क्योंकि जीवन में हम प्रायः अधर्म ही की जय देखा करते हैं। यदि यह बात न होती तो संसार में इतनी क्षुद्रता और स्वार्थ न रहता। यदि धर्म  की अंतिम जय देखने से लोग धार्मिक हो जाएँ तो धार्मिक होना कोई प्रशंसा की बात नहीं। हम तो यह देखते हैं कि संसार में जो धर्म का अनुसरण करते सत्पथ से विचलित नहीं होते, वे मृत्यु का आलिंगन करते हैं और असत्पथ पर विचरण करने वाले सुख से रहते हैं। बात यह है कि धर्म का पथ श्रेयस्कर होता है, सुखकर नहीं। जो पार्थिव सुख और समृद्धि के इच्छुक हैं, उनके लिए धर्म का पथ अनुसरण करने योग्य नहीं; क्योंकि यह पथ सुख की ओर नहीं कल्याण की ओर जाता है। नाटकों में धर्म का पराजय बतलाने से उसकी हीनता नहीं सूचित हो सकती। धर्म धर्म ही रहता है। दुःख और दारिद्र  की छाया में रहकर भी पुरुष गौरवान्वित होता है। पृथ्वी में पराजित होने पर भी वह अजेय रहता है। कुछ भी हो, अब भारतवर्ष के आधुनिक साहित्य में दुःखांत नाटकों  की रचना होने लगी है। इसमें संदेह नहीं कि कॉमेडी  की अपेक्षा ट्रेजडी का प्रभाव अधिक स्थायी होता है, इसलिए नाट्यशालाओं में इनका अभिनय अधिक सफलतापूर्वक हो सकता है। परंतु आजकल दुःखांत नाटकों का प्रचार कम हो गया है। कुछ समय पहले इंग्लैंड में म्यूज़िकल कॉमेडी—जिसमें हँसी-दिल्लगी और नाच-गान की प्रधानता रहती है—का ख़ूब दौर रहा। अभी उनका अच्छा स्थान है ही।

    हिंदू साहित्य-शास्त्रकारों ने यह नियम बना दिया है कि नाटक के नायक को सब गुणों से युक्त और निर्दोष अंकित करना चाहिए। कुछ विद्वानों की राय है कि यह नियम बड़ा कठोर है। इससे नाटककार का कार्यक्षेत्र बड़ा संकुचित हो जाता है। किंतु हिंदू-साहित्यशास्त्र में नाटक के नायकों को दोष-शून्य अंकित करने का जो विधान है, उसका एकमात्र उद्देश्य यही है कि नाटकों का विषय महत् हो। यही कारण है कि प्राचीन संस्कृत नाटकों में राजा अथवा राजपुत्र ही नाटक के नायक बनाए गए हैं। नायकों के चार भेद किए गए हैं—धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीरप्रशांत। इन नायकों में भिन्न-भिन्न गुणों का प्रदर्शन किया जाता है। आधुनिक नाट्य-साहित्य में इस नियम  की उपेक्षा  की गई है। अब तो मज़दूर, क़ैदी और पागल तक नायक के पद पर अधिष्ठित हो सकते हैं। इसका कारण यह है कि अब नाटकों में व्यक्तित्व-प्रदर्शन पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

    नाटक सभी काल और सभी देशों में लोकप्रिय होते हैं। कालिदास का कथन है—नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधनम्। अब तो नाटक जीवन की आवश्यक सामग्री बन जाने के कारण और भी अधिक लोकप्रिय हो गए हैं। लंदन आधुनिक सभ्यता का एक केंद्र-स्थान है। वहाँ सैकड़ों नाटकशालाएँ हैं। हज़ारों लोगों का जीवन निर्वाह उन्हीं से होता है। सभी नाटकघर सभी समय भरे रहते हैं। कुछ ऐसी नाटकशालाएँ हैं जहाँ दिन और रात में भी दो बार एक ही नाटक खेला जाता है। कहीं-कहीं तो एक ही नाटक दो-दो वर्ष तक खेला जाता है।

    नाटकशालाओं में सभी तरह के खेल-तमाशे दिखलाए जाते हैं। लंदन में एक ऐसी ही नाटकशाला है। उसका नाम है— Hippodrome; यहाँ दिन में दो बार खेल दिखलाए जाते हैं। प्रतिदिन छह हज़ार से अधिक लोग तमाशा देखने के लिए जाते हैं। यह सिर्फ़ रविवार को बंद रहती है। इसके संचालक एच०बी० मास साहब का बड़ा नाम है। इन्हीं के एक साथी ऑसवल्ट स्टाल साहब हैं। स्टाल साहब को लोग नाटकशाला का नेपोलियन कहते हैं। संसार में सबसे बड़ा-चढ़ा कारोबार उन्हीं का है। ग्रेट ब्रिटेन में उनकी 20 नाटकशालाएँ हैं। उनमें तरह-तरह के तमाशे होते हैं। एक सप्ताह में पाँच लाख से अधिक लोगों का मनोरंजन उन्हीं से होता है।

    खेलों में नवीनता होने से लोगों का अधिक मनोविनोद होता है। एक ही तरह के तमाशे देखते-देखते लोगों का जी ऊब जाता है। इसीलिए लोगों के मन बहलाने के नए-नए उपाय सोचे जाते हैं। मास साहब इसीलिए योरप और अमरीका में चक्कर लगा जाते थे। एक बार वे इसी मतलब से भारतवर्ष भी आए। भारत-भ्रमण के बाद आपने अपने एक मित्र से कहा—लोगों का मनोरंजन करने में भारतवासी बड़े निपुण हैं। इस देश के बाज़ीगरों, सँपेरों और पहलवानों के अद्भुत कौशल देखकर चकित रह जाना पड़ता है। इसके सिवा, योरप और अमरीका के बड़े-बड़े नगरों में उन्होंने कुछ लोगों को एजेंट बना रखा है। इनका काम है कि जहाँ उन्होंने किसी में कुछ कला-कुशलता देखी, तुरंत उससे काम लिया। यही कारण है कि लोग 'हिप्पोड्रोम' के तमाशों को इतना पसंद करते हैं।

    नाटकशालाओं का संचालन किस प्रकार होता है, यह जानने के लिए हम 'हिप्पोड्रोम' की ही कार्यप्रणाली पर दृष्टिपात कर लें।

    'हिप्पोड्रोम' में काम करने वालों के दो दल किए जा सकते हैं। एक तो वे जो पर्दे के भीतर काम करते हैं और दूसरे वे जो बाहर काम करते हैं। बाहर काम करने वालों में नोटिस बाँटने वालों से लेकर मैनेजर तक सभी शामिल हैं। रंगमंच के लिए एक दूसरा ही मैनेजर होता है। उसे स्टेज मैनेजर कहते हैं। हिप्पोड्रोम में पर्दे के बाहर 150 आदमी काम करते हैं और भीतर 170।

    जो मैनेजर बाहर रहता है, उसकी सहायता के लिए दो और आदमी रहते हैं। रुपए-पैसे का हिसाब-किताब उन्हीं के ज़िम्मे रहता है। ये लोग रंगभूमि में इधर-उधर टहलते रहते है। दर्शकों को यदि कोई असुविधा हुई तो तुरंत ही जाकर वे उसे दूर कर देते हैं। आँख तो इनकी दर्शकों की सुविधा पर रहती है, पर हाथ दर्शकों की नब्ज़ पर रहता है। वे तुरंत ताड़ जाते हैं कि कौन-सा खेल उन्हें रुचिकर हुआ।

    मैनेजर के लिए यह भी आवश्यक है कि वह बहुभाषाविज्ञ हो। लंदन में योरप के सभी देशों के लोग आते-जाते रहते हैं। कम से कम फ़्रेंच, इटालियन, जर्मन और रशियन भाषा का तो अवश्य ज्ञान होना चाहिए।

    नाटकशाला में स्टेज मैनेजर का पद सबसे अधिक महत्त्व का है, क्योंकि नाटक का सारा दारोमदार उसी पर रहता है। वही रंगभूमि का सब प्रबंध करता है। खेल को चित्ताकर्षक और प्रभावोत्पादक बनाना उसी का काम है। उसके अधीन काम करने वालों में मास्टर कार्पेंटर का काम बड़े महत्त्व का होता है। स्टेज के सभी सामान, सीन-सीनरी से लेकर मेज़-कुर्सी तक, उसी  की देखभाल में तैयार होते और दुरुस्त किए जाते हैं।

    आजकल के रंगमंच पर तरह-तरह के दृश्य दिख जाते हैं। इसके लिए ख़ूब ख़र्च किया जाता है। एक बार सिर्फ़ एक कोच के बनाने में ही एक हज़ार पौंड ख़र्च किया गया था। यह गाड़ी काँच की बनाई गई थी और उसमें बिजली के लैंप लगाए गए थे। गाड़ी ऐसी दीप्तिमय हो रही थी कि मानो सचमुच स्वर्गीय रथ हो। दृश्यों को प्रभावोत्पादक बनाने और उनमें स्वाभाविकता लाने के लिए उन पर भिन्न-भिन्न वर्णों के प्रकाश डाले जाते हैं। इसके लिए एक गैलरी बनी रहती है। वहीं से रंगभूमि पर प्रकाश डाला जाता है। कुछ समय से पाश्चात्य देशों के रंगमंचों पर प्राच्य देश के दृश्य ख़ूब दिखलाए जाने लगे हैं। सरस्वती के पाठक अभी भूले न होंगे कि इंग्लैंड में कुछ समय पहले सती-दाह का दृश्य दिखलाने के लिए कितना आंदोलन मचा था। अभी हाल में जिन नाटकों को ख़ूब सफलता हुई है उनमें 'बेलाडोना, 'किसमत', 'मिस्टर बू' आदि नाटक प्राच्य देशों से भी संबंध रखते हैं।

    रंगमंच पर प्राच्य देशों का यथार्थ दृश्य दिखलाने के लिए कुछ लोग इन देशों में जाकर फ़ोटो लेते हैं, पोशाक संग्रह करते हैं और ऐसी चेष्टा करते हैं कि दृश्य बिलकुल स्वाभाविक हो। रंगभूमि में दृश्य परिवर्तन बड़ी सावधानी से किया जाता है। पर्दों का ऐसा झमेला रहता है कि अगर थोड़ी सी भूल हुई तो रंगभूमि में कुछ का कुछ हो जाता है। स्टेज मैनेजर का ध्यान इस पर सदा बना रहता है।

    नाट्यकला में प्रवीणता प्राप्त कर लेना सबका काम नहीं है। किसी-किसी में तो यह जन्मसिद्ध प्रतिभा होती है, परंतु कुछ लोग शिक्षा और अनुभव से भी अच्छी योग्यता प्राप्त कर लेते हैं। जो थिएटर का मैनेजर होता है, उसमें इतनी बुद्धि होनी चाहिए कि वह सच्ची योग्यता परख ले। हिप्पोड्रोम के मैनेजर के पास हज़ारों लोगों  की अर्ज़ियाँ आती हैं। उनमें से वे उन्हीं लोगों को चुन लेते हैं जिनमें कुछ विशेषता पाते हैं। जो नाट्यकला में प्रवीण होते हैं, उनकी आमदनी भी अच्छी होती है।

    नाटकशाला में छोटे-छोटे बच्चे भी नियुक्त किए जाते हैं। इन्हें प्रति सप्ताह एक पौंड तक मिल जाता है। बाल्यकाल से रंगभूमि में शिक्षा पाते रहने के कारण इनमें अधिकांश नाटक-कला में बड़े प्रवीण हो जाते हैं। परंतु कुछ लोग नाटकशालाओं में बच्चे की नियुक्ति के बड़े विरोधी हैं। इंग्लैंड में एक क़ानून भी बन गया है जिससे कम उम्र के लड़के नाटकघरों में नहीं लिए जाते।

    यह तो हम कह आए हैं कि नाटकशालाओं में दर्शकों की सुविधा का ख़ूब ख़याल किया जाता है। जो पूरे अप-टू-डेट थिएटर होते हैं, उनकी छत ऐसी बनी रहती है कि जब चाहे तब उसे हटा लें। जब आकाश स्वच्छ रहता है तब वह हटा दी जाती है जिससे दर्शकों को स्वच्छ वायु मिलती रहती है। नाटकशाला में ऐसा भी प्रबंध किया जाता है कि जैसी ऋतु हो उसी के अनुकूल हवा दर्शकों को मिले। हवा के प्रवेश द्वार पर ventilating apparatus रहता है। इसी में से होकर हवा भीतर जाती है। गर्मी के दिनों में वह ठंडी कर ली जाती है और ठंड में गर्म।

    कभी हमारे देश में नाटकों का बड़ा आदर था। नाटक खेलने वाले नट और नटियों  की अच्छी प्रतिष्ठा की जाती थी। इतना ही नहीं, उच्च कुल के स्त्री-पुरुष भी में नाट्यकला में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए चेष्टा करते थे। उन्हें अभिनय कला की शिक्षा देने के लिए योग्य शिक्षक नियुक्त किए जाते थे। कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक से ये सब बातें विदित होती हैं। अब नाटक-कला का पुनरुद्धार हो रहा है। महाराष्ट्र और बंगाल में अच्छी-अच्छी नाटक-मंडलियाँ हैं और उनमें अच्छे-अच्छे नाटक खेले जाते हैं। संभव है, कभी हिंदी नाटकों के लिए भी एक अच्छी नाटक-मंडली स्थापित हो जाए और हिंदी में उच्च श्रेणी के नाटक निकलने लगें। अभी तो वह समय दूर जान पड़ता है।
    स्रोत :
    • पुस्तक : सरस्वती (पृष्ठ 39)
    • रचनाकार : कमलाकांत मिश्र
    • संस्करण : 1921

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