नर्मदा वर्णन

स्वयंभू

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    पेक्खेँवि एंतहों रिद्धि वसंतहों महु-इक्खु-सुरासब-मंती।

    णम्मय-वाली भुम्भल-भोली भमइ सलोगहों रंत्ती॥

    णम्मयाएँ मयरहरहों जंतिएँ। णाइँ पसाहणु लइउ तुरंतिएँ॥

    घवघवंति जे जल-पव्भारा। ते जि णाइँ णेउर-झंकारा॥

    पुलिणइँ जाइँ वे वि सच्छायइँ। ताइँ जें उड्ढणाइँ णं जायइँ॥

    जं जलु खलइ वलइ उल्लोलइ। रसणा-दामु तं जि णं घोलइ॥

    जे आवत्त समुट्ठिय चंगा। ते जि णाइँ तणु-तिवलि-तरंगा॥

    जे जल-हत्थि-कुंभ सोहिल्ला। ते जि णाइँ थण अद्धुम्मिल्ला॥

    जो ढिंढीर-णियरु अंदोलइ। णावइ सो जें हारु रंखोलइ॥

    जं जलयर-रण-रंगिउ पाणिउ। जि णाइँ तम्वोलु समाणिउ॥

    मत्त-हत्थ-मय-मइलिउ जं जलु। तं जि णाइँ किउ अक्खिहिं कज्जलु॥

    जाउ तरंगणिउ अवर-ओहउ। ताउ जि भंगुराउ भउहउ॥

    जाउ भमर-पंतिउ अल्लीणउ। केसावलिउ ताउ दिण्णउ॥

    वसंत की ऋद्धि को देखकर मधु, इक्षुरस और सुरा से मस्त, भोली-भाली नर्बदा नदीरूपी बाला ऐसी मचल उठी, मानो कामदेव की रति ही मचल उठी हो।

    समुद्र को जाती हुई उसने तुरंत अपनी साज-सज्जा बना ली। कल-कल करती जल की धाराएँ, उसके नूपुरों की झंकार थी, कांतिवाले किनारे उसकी ओढ़नी थी, उछलता-खलबलाता जल उसकी करधनी की ध्वनि को व्यक्त कर रहा था। जो बढ़िया आवर्त उठ रहे थे वही उसके शरीर की त्रिबलि-तरंग के समान थे। जो रोमिल शरीर जलहाथियों के कुंभ-स्थल थे वही उसके अधखुले स्तन थे। हिलता-डुलता फेनसमूह हार के रूप में शोभित हो रहा था। जलचरों के युद्ध से रंगा हुआ पानी ही उसका तांबूल था। मदमाते हाथियों के मदजल से मटमैला पानी ही आँखों का काजल था, ऊपर नीचे आने वाली तरंगे ही बाहुओं का चित्र राग थीं। उसकी आश्रित भ्रमरमाला ही केशकलाप थी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पउम चरिउ (पृष्ठ 216)
    • संपादक : हंसराज बच्छराज नाहटा
    • रचनाकार : स्वयंभू
    • प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ, काशी
    • संस्करण : 1944

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