छप्पय

रोला और उल्लाला, दो छंदों से बना हुआ छह पंक्तियों का मिश्रित छंद। प्रथम चार पंक्तियों में 24-24 मात्राएँ (11-13 पर ठहराव) तथा अंतिम दोनों पंक्तियों में 28-28 (कहीं-कहीं 26-26) मात्राएँ। 15-13 मात्राओं पर (यति) ठहराव।

भक्तिकाल और रीतिकाल के संधि कवि। काव्यांग निरूपण, उक्ति-वैचित्र्य और अलंकारप्रियता के लिए स्मरणीय। काव्य- संसार में ‘कठिन काव्य के प्रेत’ के रूप में प्रसिद्ध।

1555 -1617

अकबर के नवरत्नों में से एक। भक्ति और नीति-कवि। सरस हृदय की रमणीयता और अन्योक्तियों में वाग्वैदग्ध्य के लिए प्रसिद्ध।

1538 -1625

'चरनदासी संप्रदाय' से संबंधित संत चरणदास की शिष्या। कविता में सर्वस्व समर्पण और वैराग्य को महत्त्व देने के लिए स्मरणीय।

1693 -1773

जयपुर नरेश सवाई प्रतापसिंह ने 'ब्रजनिधि' उपनाम से काव्य-संसार में ख्याति प्राप्त की. काव्य में ब्रजभाषा, राजस्थानी और फ़ारसी का प्रयोग।

1764 -1803

'टट्टी संप्रदाय' से संबद्ध। कविता में वैराग्य और प्रेम दोनों को एक साथ साधने के लिए स्मरणीय।

अकबर के दरबारी कवि। भक्ति और नीति संबंधी कविताओं के लिए स्मरणीय।

1505 -1610

रीतिकाल के सरस-सहृदय आचार्य कवि। कविता की विषयवस्तु भक्ति और रीति। रीतिग्रंथ परंपरा में काव्य-दोषों के वर्णन के लिए समादृत नाम।

भक्ति-काव्य की कृष्णभक्त शाखा के माधुर्योपासक कवि। राधावल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक।