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दोउ सुख झाँकै झरोषनि
दोउ सुख झाँकै झरोषनि अलियाँ।सैन किलोलत लोल रसिक मन मैन बढ़यो ज्यों रैन सुघुलियाँ॥
कृपानिवास
जो सुख लेत सदा ब्रजवासी
जो सुख लेत सदा ब्रजवासी।सो सुख सपनेहुँ नहिं पावत, जे जन हैं बैकुंठ-निवासी॥
नागरीदास
बृन्दावन बसि यह सुख लीजै
बृन्दावन बसि यह सुख लीजै।सात समय की टहल महल बिनु, इकछिन जान न दीजै॥
अलबेलीअलि
करो सुभग सुख मद मतिवारी
करो सुभग सुख मद मतिवारी।सुघरि उघरि उज्ज्वल रस तेरे मेरो मन होरो अधिकारी॥
कृपानिवास
जो सुख होत भक्त घर आये
जो सुख होत भक्त घर आये।सो सुख होत नहीं बहु संपति, बाँझहिं बेटा जाये॥
हरीराम व्यास
सब तजि वृंदावन सुख लीजै
सब तजि वृंदावन सुख लीजै।प्रफुलित ललित सोहनो बहु दिसि, लखि उर धीर धरीजै॥
हीरासखी
स्यामाजू के सरन जे सुख न सिराने
स्यामाजू के सरन जे सुख न सिराने।तिन कौं सुख सपनैं न लिख्यौ जे फिरत विविध बौराने॥
बिहारिनिदेव
सुख-दुख तन-मनि लावणा
सुख-दुख तन-मनि लावणा, रघुनाथ न लिखाया।कोई टाल्यां नंई टले, नल सरिका राज वई।
सैन भगत
केते दिन भये रैनि सुख सोये
केते दिन भये रैनि सुख सोये।कछु न सुहाई गोपालहि बिछुरे रहे पूंजी सो खोये॥
परमानंद दास
जयति श्री राधिके सकल-सुख-साधिके
जयति श्री राधिके सकल-सुख-साधिके,तरुनि-मनि नित्य नवतन किसोरी।
गदाधर भट्ट
पौढ़े सुख सैन रैन रंग
पौढ़े सुख सैन रैन रंग महल मैं।सुरति सरोवर हंस हंसनी करत किलोल मद मदन गहल मैं॥
कृपानिवास
हौं बलि जाऊँ, मुख सुख-रास
हौं बलि जाऊँ, मुख सुख-रास।जहाँ त्रिभुवन-रूप सोभा, रीझि कियौ निवास॥
चाचा हितवृंदावनदास
आज नाथ एक बर्त्त माँहि सुख लागत है
आज नाथ एक बर्त्त माँहि सुख लागत हे।तोहें सिव धरि नट वेष कि डमरू बजाएब हे॥
विद्यापति
किये सपथ कहुँ तोहिं प्राणप्रिया
किये सपथ कहुँ तोहिं प्राणप्रिया निज हीय की।अस न अपन पौ मोहिं जैसे प्रिय तुम लगति हौ॥
बाल अली
ओं तंते मंते जोत जगाई
एकै हाथ न ताळी बाजै, रळ दोय काया उपाई [पकाई]।धिन है ज्ञानी ज्ञान बे साझा, काची काया उपाई [पकाई]।