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तें नर सुख कीये घने
तें नर सुख कीये घने, दुख भोगये अनंत।अब सुख दुख कौ पिठी दें, सुन्दर भजि भगवंत॥
सुंदरदास
जतन बहुत सुख के किये
जतन बहुत सुख के किये, दुख को कियो न कोइ।कहु नानक सुन रे मना, हरि भावे सो होइ॥
गुरु तेग़ बहादुर
पति के सुख सुख मानती
पति के सुख सुख मानती, पति दुख देखि दुखाति।रतनावलि धनि द्वैत तजि, तिय पिय रूप लखाति॥
रत्नावली
सुख में संग मिलि सुख करै
सुख में संग मिलि सुख करै, दुख में पाछो होय।निज स्वारथ की मित्रता, मित्र अधम है सोय॥
गिरिधारन
‘तुलसी’ काया खेत है
‘तुलसी’ काया खेत है, मनसा भयौ किसान।पाप-पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान॥
तुलसीदास
रतिरुझ में सुख समुझ मन
रतिरुझ में सुख समुझ मन, पें कहि सके न बाक।कटुताई में मिष्टता, जैसि करेला साक॥
दयाराम
सुख कें दुख सनेह में
सुख कें दुख सनेह में, विद्वन देहु जुवाब।जो दुख तो सब करत क्यों, क्यों सुख तों परिताप॥
दयाराम
समय समुझि सुख-मिलन कौ
समय समुझि सुख-मिलन कौ, लहि मुख-चंद-उजास।मंद-मंद मंदिर चली, लाज-सुखी पिय-पास॥
दुलारेलाल भार्गव
सुन्दर सुख की चाह करि
सुन्दर सुख की चाह करि, कर्म करै भू भांति।कर्मनि कौ फल दुःख है, तूं भुगतै दिन-राति॥
सुंदरदास
लहत खेद सुख हेत जन
लहत खेद सुख हेत जन, कारन जानत नाहिं।भजत कृष्ण कों सुख सबै, अनायास मिलि जाहि॥
दीनदयाल गिरि
सुख दुख अरु विग्रह विपति
सुख दुख अरु विग्रह विपति, यामे तजै न संग।गिरिधरदास बखानिये, मित्र सोइ वर ढंग॥
गिरिधारन
स्वारथ सुख सपनेहुँ अगम
स्वारथ सुख सपनेहुँ अगम, परमारथ न प्रबेस।राम नाम सुमिरत मिटहिं, तुलसी कठिन कलेस॥
तुलसीदास
सुख जीवन सब कोउ चहत
सुख जीवन सब कोउ चहत, सुख जीवन हरि हाय।तुलसी दाता माँगनेउ, देखिअत अबुध अनाथ॥
तुलसीदास
तो कारन गृह-सुख तजे
तो कारन गृह-सुख तजे, सह्यो जगत कौ बैर।हमसों तोसों मुरलिया, कौन जनम कौ घैर॥
नागरीदास
सुख निद्रा पौढ़े अरघ
सुख निद्रा पौढ़े अरघ, नारी स्वर से होय।प्रेम समाधि लगी मनौ, सखि जानत सुख सोय॥
बाल अली
जा घर मैं बहु सुख किये
जा घर मैं बहु सुख किये, ता घर लागी आगि।सुन्दर मीठौ ना रुचेै, लौंन लियौ सब त्यागि॥