उसका दुख

uska dukh

नीलाभ

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उसका दुख

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और अधिकनीलाभ

    हर बार तुम याद करोगे

    हर बार तुम पाओगे :

    कहने को कुछ नहीं है

    हर बार तुम इसी तरह लौट-लौट आओगे

    जब तुम्हें आगे रास्ता नहीं मिलेगा।

    तुमने देखा है घरों का उजड़ना

    और ज़िंदगी में बहुत जल्द ही

    समय को पहचान लेना।

    अब तुम्हारे अंतर के गहरे पानी को चीर कर

    कोई नाम, कोई चेहरा नहीं उभरता

    तुम्हारे दिमाग़ के अँधियारे शून्य में

    रोशनी का एक तिनका भी प्रवेश नहीं करता।

    शब्द वह सब नहीं कह सकते

    जो तुमने सहा है

    जिसे तुमने बहरी दीवारों के सामने बार-बार कहा है

    तो क्या तुम हर बार इसी तरह टूटते रहोगे?

    हर बार तुम याद करोगे

    हर बार तुम पाओगे : पीछे छुटे खेत,

    अनुर्वर धरती, दरकी हुई परती,

    कृष्णकाय पिंजर, नीची छतों वाले घर,

    ज़ख़्मी पाँव, अपमान और विद्वेष में डूबे हुए गाँव

    पीला धुँआ जिनसे निकल कर उन्हीं के ऊपर छा जाता।

    तुम्हें ऊपर उठाता हुआ सिर्फ़ एक ख़ाली आकाश था

    सिर्फ़ एक आशारहित समय था,

    जो धीरे-धीरे बीत जाता

    एक राग बज उठता सन्नाटे में

    उसे चीरता हुआ। और फिर, और फिर

    सिर्फ़ एक अँधेरा रह जाता

    तुम्हारे अंदर और बाहर

    अपनी ख़ामोश अदृश्य बाँहों में घेरता हुआ

    शहर और सपने और लोग।

    दोस्त या दुश्मन :

    वह चेहरा एक ही था। अंतहीन और उदास।

    अपने दिमाग़ में लिए हुए लपटों के पेड़, आग और

    नि:शब्द सुलगते हुए जंगल

    वह भटकता रहता शहर की गलियों में,

    काली सर्द सड़कों पर। विक्षिप्त।

    खोजता हुआ वह एक ताल-मेल

    जो उसे लौटा सके

    उसकी खोई हुई याददाश्त में गूँजते हुए

    अनुत्तरित प्रश्न—अस्वीकृत उत्तर—अंतहीन संवाद।

    हर बार तुम याद करने की कोशिश करोगे

    हर बार तुम पाओगे :

    ज़ाहिरा तौर पर ठीक नज़र आने वाली चीज़ों के नीचे

    काई-भरी दलदल के लंबे विस्तार।

    अक्सर तुम्हें लगता है, अँधेरी गलियाँ

    ले जा कर तुम्हें जिस मकान तक छोड़ आती हैं

    वह किसी दूसरे का है।

    दूसरों के घरों में रहना।

    दूसरों के जूतों में चलना।

    दूसरों के चेहरों को अपना लेना।

    सितार जैसा महीन बजता हुआ संगीत सुनना

    और जानना कि वह क्या है

    जो तुम्हारी आवाज़ को

    बारीक तारों के जाल में बाँध देता है

    रोशनी का प्रतिरोध करने वाले—

    वे कोई भी हों—

    उनका कोई देश नहीं है। लेकिन

    तुम कहाँ घूमते रहे हो सारा दिन?

    तुम्हारे ऊपर मैले, नील-लगे पुराने कपड़े-सा आकाश है

    तुम्हारे चेहरे पर धूल है और

    अंदर की आग के बदनुमा दाग़।

    तुम्हारी आँखों में हैं : बिखरते हुए शरीर,

    टूटते हुए आईने और उछलते रंगों की तरह शब्द।

    तुम्हारे दिमाग़ में :

    काले अक्षरों की क्रमहीन पंक्तियों पर फैलते हुए

    बेकारी के स्याह धब्बे। नि:शब्द। लगातार

    हर बार तुम याद करोगे

    हर बार तुम पाओगे :

    कुछ होता है कि बहुत कुछ पीछे छूट जाता है

    तलाश करते-करते आदमी कुछ नहीं पाता, टूट जाता है

    वह जो गुज़रता है दिल के दरवाज़े से होकर

    दिमाग़ के दरवाज़े उसके लिए बंद रहते हैं

    भय और आतंक : शंका और अपमान और द्वेष

    एक अनवरत यात्रा है—

    दिल के दरवाज़ों से होकर

    कुल जमा

    लपटों से घिरे हुए

    तुम्हारे दिमाग़ के दरवाज़ों तक।

    कोई रो रहा है

    तुम्हारे कमरे के बाहर।

    अँधेरे में। लगातार

    कोई रो रहा है

    तुम्हारे कमरे की खिड़की के बाहर

    सदियों से।

    उसका दुख तुम तक नहीं पहुँचता।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कुल जमा-1 (पृष्ठ 139)
    • रचनाकार : नीलाभ
    • प्रकाशन : शब्द प्रकाशन
    • संस्करण : 2012

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