तपता लोहा

tapta loha

विनोद दास

विनोद दास

तपता लोहा

विनोद दास

और अधिकविनोद दास

    सँकरी-सी जगह में

    सीढ़ियों के पास

    एक पुरानी मेज़ पर

    अक्सर झुकी रहती है उसकी गर्दन

    मानो गल गई हो उसकी रीढ़ की हड्डी

    उसके आस-पास होते हैं

    ढेर सारे कपड़े

    ढेर सारे रंग

    ढेर सारे कोयला

    ढेर-सी राख

    राख का रंग मिलता है

    उसकी इच्छाओं से बहुत

    वह चाहता है

    पहनें लोग कपड़े धुले और साफ़

    साफ़ कपड़ों की तरह हों उनके हृदय साफ़

    उसके हाथ में है

    इस वक़्त

    एक तपता हुआ लोहा

    उसके इरादों की तरह गरम

    जो जल्दी ठंडा नहीं होगा

    वह मिटाता रहता है कपड़ों की झुर्रियाँ

    हालाँकि उसका चेहरा ख़ुद झुर्रियों का थैला है

    उसे कुछ शब्दों से बेहद प्यार है

    कुछ से बेहद चिढ़

    चिढ़ने पर वह जवाब तक नहीं देता

    किंतु पुकारने पर राधू भाई

    उसकी आँखें नरम हो जाती हैं

    इस क्रूर शहर में

    उसे हर चीज़ लगती है अनूठी

    बिस्तर पर बदलते हुए अकेले करवट

    वह करता है बातें

    चंद्रमा से मीठी-मीठी

    गर्मियों में

    उसे आती है बेतरह याद

    आँधी में झरते आमों की

    सुनता है वह नींद में आवाज़

    छुक-छुक जाती गाड़ी की

    स्रोत :
    • पुस्तक : ख़िलाफ़ हवा से गुज़रते हुए (पृष्ठ 26)
    • रचनाकार : विनोद दास
    • प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ
    • संस्करण : 1986

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