बीड़ी बुझने के क़रीब

biDi bujhne ke qarib

मानबहादुर सिंह

मानबहादुर सिंह

बीड़ी बुझने के क़रीब

मानबहादुर सिंह

और अधिकमानबहादुर सिंह

    एक क़मीज़ जिसमें अपनी पहचान

    वह पहनता है

    सभी अपनी पहचान ही पहनते हैं

    क़मीज़ के रंगों में।

    वह मिल सकता है—किसी भी समय

    चौमुहानी के बग़ल, फ़क़त अली की दुकान पर

    बटोरता रंगीन क़तरनें।

    क़मीज़ के बाहर का वह हिस्सा

    जिस पर सतरंगी टोपी-तिरछे धर

    पुलिया पर बैठा

    कान पर से अधजली बीड़ी उतार सुलगाता है।

    ठीक उसी वक़्त

    मैं उसके सामने खड़ा होता हूँ

    मुँह में बीड़ी का पतला बासी सिरा

    कसैला धुआँ उगलता है

    सामने सुलगता धुआँ आँखों में छलकता है।

    धुआँई हथेली को माथे पर धर कर

    सलाम ठोक पूछता है—

    अगला चुनाव कब होगा?

    उसे ताज्जुब नहीं होता अपने प्रश्न पर

    मेरे पास तो सरक आती है पुलिया

    एक संकट में बिफरने लगती है दुपहर

    इस प्रश्न को उतरने का भयावह उत्तर

    फ़क़त अली की खिचखिच मशीन में

    गुम हो जाता है।

    भटके से निकले तागे के साथ

    सुई के छेद से मुस्कुराता है

    वह जानता है

    उसने ही लोगों को—उनकी औक़ात से सिला है

    किस जोड़ पर सीवन कमज़ोर पड़ी है

    चोर थैलियाँ कितनों के सीने पर गड़ी हैं

    ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने

    अपना इस्तेमाल इन कपड़ों के लिए किया है

    और वे भी जो कपड़ों का इस्तेमाल

    अपने लिए किया है—बहरहाल

    सभी रंग उसकी टोपी में

    झंडे की तरह

    हर झंडे के नीचे आदमी कपड़े की तरह

    आगामी चुनवों में

    आदमी नहीं—झंडे चुने जाएँगे। मैंने कहा

    बीड़ी बुझने के क़रीब

    वह पास खिसक आया

    मेरी क़मीज़ का बटन खोल धीरे से मुस्कुराया

    मैंने बारहा समझाया—

    वह तब भी वहीं मिलेगा

    क़तरनें जोड़ता पुलिस से सटकर

    किसी फटी क़मीज़ की तरह।

    नीचे नाले में काले पानी के किनारे

    कूँथती सुअरनियाँ-बतख़ें

    नंग-धड़ंग धोबी के बच्चे

    चश्मदीद गवाह हैं

    उसकी फेंकी हुई बीड़ियों का

    फ़ैसले दर फैसले के दरमियान।

    —मैंने कहा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रचना संचयन (पृष्ठ 55)
    • संपादक : जीवन सिंह, केशव तिवारी
    • रचनाकार : मानबहादुर सिंह
    • प्रकाशन : बोधि प्रकाशन
    • संस्करण : 2016

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