मुझे माफ़ करना मेरे दोस्त!

mujhe maf karna mere dost!

अनुपम सिंह

अनुपम सिंह

मुझे माफ़ करना मेरे दोस्त!

अनुपम सिंह

और अधिकअनुपम सिंह

    जब तुम्हें समझ में नहीं रही थी मैं

    और हर बात पर मेरी विस्मित हँसी

    उन दिनों मैं किसी और के प्रेम में थी

    तुम अपनी सारी मुलायमियत

    उँगलियों में भर छू रहे थे मुझे

    तुम अव्वल प्रेमी थे,

    तुम्हारी आँखों में शावक-सी कोमलता थी

    फिर भी मैं भाग रही थी तितलियों के पीछे

    बस! ओस से भीगे उनके पंख और मेरी पलके थीं

    पराग से सनी हुई! सुगंधित पलकें!

    मुझे माफ़ करना मेरे दोस्त!

    मैं उस रात नहीं थी तुम्हारे साथ

    जब बिलगा दिया था तुम्हारा हाथ अपनी पीठ से

    करवट बदल कहा था कि आज जी ठीक नहीं

    मैं बना रही थी एक नाव

    आकाशगंगा में उतरने के लिए

    बेरा का फूल ब्रह्मकमल-सा गूँथ रही थी

    बैठ ब्रह्मपुत्र के किनारे

    मैं खिला रही थी अपनी बत्तख़ों को चारा

    मछलियाँ मेरे बग़ल बैठ सुना रही थीं

    जल-वासिनी होने के क़िस्से

    मछलियों की कहन बड़ी मीठी और दुःख भरी है

    तुम भी सुनना कभी उन्हें

    मैं मेंढकों का संभोग देख

    अचानक मुड़ी थी तुम्हारी ओर

    कि जलमुर्ग़ियों का तैरना और उस तरह डूब जाना

    मुझे प्रिय लगा

    मुझे माफ़ करना मेरे दोस्त!

    उस रात किसी बात का जवाब नहीं दे पाई

    नहीं बता पाई तुम्हें कि कोई आँख, कोई चेहरा

    किसी की बाज़ूबंद वाली बाँहें

    अपनी पूरी कोमलता और कठोरता में घेरे हुए हैं मुझे

    कि आज रात डूबना चाहती हूँ बस उसी के हृदय में

    समझना, सहेजना चाहती हूँ उसी का रहस्य

    उसी की निधि।

    मुझे माफ़ करना मेरे दोस्त!

    कि तुम्हें बिस्तर पर अकेला छोड़

    भीतर का दरवाज़ा खोल मैं उतर गई थी

    फिसलन भरी सीढ़ियाँ

    कि एक बार मिल सकूँ उसे एकांत में

    उन दिनों वह मेरी बंद आँखों में झाँकता था

    जैसे बंद दरवाज़े से अँधेरे में झाँकता है कोई ढीठ बच्चा

    उसकी छोटी-छोटी भेंट-मुलाक़ातों के बाद

    मेरी उँगलियाँ अधिक अपनापे से फिरीं

    तुम्हारे बालों में

    फिर भी मुझे माफ़ करना मेरे दोस्त!

    उस दिन सिर्फ़ तुम्हारे लिए उल्टे पाँव

    लौट आई थी मैं

    तुम्हें नवजात-सा गोद में भर

    कराया स्तनपान

    वह रात सिर्फ़ तुम्हारे लिए थी

    तुम्हें अपनी देह से अलगा नहीं पाई थी

    सबेरा होने तक!

    लेकिन मुझे माफ़ करना मेरे दोस्त!

    शायद! तुम्हारे साथ भी घटित हुआ हो संयोग ऐसा

    कि मेरे बालों से मेरी नाभि तक उँगलियाँ फिराते-फिराते

    याद करने लगे हो बिछड़ गई प्रेमिका को

    जिसकी गहरी रात-सी काली आँखों के बीच

    सफ़ेद चाँद-सी पुतरियाँ तुम्हें प्रिय थीं!

    जिसके बाल बरगद की जड़ों की तरह

    नीचे की ओर अधिक बढ़ते गए थे!

    उसके गर्दन की रोमावलियाँ तुम्हें हर बात के लिए उकसाती थीं!

    जीवन में हो सकते हैं कुछ छिपे हुए राज़ और रहस्य

    कविता सारे रहस्यों को खोल देती है!

    कि तुम्हारे अचानक गुदगुदी करने पर

    हँसने के बजाय रोने लगी थी जिस दिन

    उस दिन मैं किसी और के प्रेम में थी

    और तुम बेक़सूर होकर भी अचंभित थे!

    मुझे माफ़ करना मेरे दोस्त!

    स्रोत :
    • रचनाकार : अनुपम सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    संबंधित विषय

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY

    जश्न-ए-रेख़्ता (2023) उर्दू भाषा का सबसे बड़ा उत्सव।

    पास यहाँ से प्राप्त कीजिए