छत की तलाश

मलखान सिंह

छत की तलाश

मलखान सिंह

और अधिकमलखान सिंह

    इस अपरिचित बस्ती में

    घूमते हुए मेरे पाँव थक गए हैं

    अफ़सोस! एक भी छत

    सर ढँकने को तैयार नहीं।

    हिंदू दरवाज़ा खुलते ही

    क़ौम पूछता है और—

    नाक-भौं सिकोड़—

    ग़ैर-सा सलूक करता है।

    नमाज़ी-दरवाज़ा

    बुतपरस्त समझ

    आँगन तक जाने वाले रास्तों पर

    कुंडी चढ़ाता है

    हर आला दरवाज़े पर

    पहरा खड़ा है और—

    मेरे ख़ुद के लोगों पर

    घर है, मरघट।

    अब! केवल यही सोच रहा हूँ मैं

    कि सामने बंद दरवाज़े पर

    दस्तक नहीं, ठोकर दूँगा।

    दीवालें चूल से उखाड़

    ज़मीं पर बिछा दूँगा।

    चौरस ज़मीं पर

    मकाँ ऐसा बनाऊँगा

    जहाँ हर होंठ पर

    बंधुत्व का संगीत होगा

    मेहनतकश हाथ में—

    सब तंत्र होगा

    मंच होगा

    बाज़ुओं में—

    दिग्विजय का जोश होगा।

    विश्व का आँगन

    वृहद् आँगन

    हमारा घर बनेगा

    हर अपरिचित पाँव भी

    अपना लगेगा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दलित निर्वाचित कविताएँ (पृष्ठ 51)
    • संपादक : कँवल भारती
    • रचनाकार : मलखान सिंह
    • प्रकाशन : इतिहासबोध प्रकाशन
    • संस्करण : 2006

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