एक चीनी कलाकार और उसकी कृतियाँ

ब्रजमोहन वर्मा

एक चीनी कलाकार और उसकी कृतियाँ

ब्रजमोहन वर्मा

और अधिकब्रजमोहन वर्मा

    हाल में एशियाई शिक्षा कांफ्रेंस का बनारस में जो अधिवेशन हुआ था, उसमें एशिया के विभिन्न देशों से प्रतिनिधि आए थे। इन प्रतिनिधियों में चीन देश के एक महान प्रतिभाशाली व्यक्ति मि० जान फू काउ भी थे। काउ महाशय के सदृश विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्ति संसार में कम मिलेंगे। वे कवि हैं, लेखक हैं, चित्रकार हैं, क्रांतिकारी देशभक्त हैं, दृढ़ सैनिक हैं और चतुर सेनानी हैं। काउ महाशय की प्रतिभा में विरोधी बातों का विचित्र सम्मिश्रण दिखाई देता है। एक ओर कवि की कमनीय वाणी है, तो दूसरी ओर क्रांति की प्रचंड ज्वाला! इधर चित्रकार  की सुकुमार कल्पना है और उधर सैनिक का कठोर कर्तव्य! जिस मनुष्य को लेखनी, तूलिका और तलवार पर एक-सा अधिकार हो, वह निश्चय ही विचित्र कहा जाएगा; परंतु कवि काउ, राजनीतिज्ञ काउ, चित्रकार काउ और सेनापति काउ में—चीन के बाहर—चित्रकार काउ ही सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। इसके दो कारण है—एक तो उनकी चित्रकला की प्रतिभा उनकी अन्य बातों की प्रतिभा से अधिक बढ़ी-चढ़ी है; दूसरे, उनकी कविता चीनी भाषा में होती है। साथ ही उन की राजनीतिज्ञता और सैन्य संचालन आदि का संबंध केवल चीन की घरेलू राजनीति से है, इसलिए बाह्य-संचार चित्रकार काउ से ही अधिक परिचित है। 

    काउ महाशय का जन्म चीन के क्वांग-टांग प्रदेश में हुआ था। उन्होंने चीन के प्रसिद्ध चितेरे चू लिन से चित्रकला की शिक्षा पाई थी। युवक काउ का मन तांग और मिंग राजवंशों के चित्रों की ओर आकर्षित हुआ, और उसने कुछ दिनों तक इन चित्रों का अध्ययन भी किया; परंतु काउ की प्रतिभा चीनी चित्रकला की पुरानी परंपरा के छोटे घेरे में बंद रहने वाली नहीं थी। उन्होंने एक नए मार्ग का अवलंबन किया और शीघ्र ही अपने गुरु से कहीं आगे निकल गए। उन्होंने अपने चित्रों में चीनी चित्रकला की विशेषताओं के प्रभाव को अक्षुण्ण रखते हुए भी उनमें एक नवीनता उत्पन्न करके अपने व्यक्तित्व की छाप लगा दी।

    फिर उन्होंने यूरोपियन कक्षा की ओर दृष्टि फेरी, और फ़्रेंच शैली के शिल्प पर ख़ासा अधिकार प्राप्त किया। उन्होंने फ़्रेंच चित्रकला मोशियो बाली सरीखे विख्यात कलाकार की अधीनता में रहकर सीखी थी।

    ऊपर कहा जा चुका है कि महाशय जान फू काउ केवल चित्रकार ही नहीं, बल्कि कवि और लेखक भी हैं। उनकी कविताओं में 'मेढकी का गाम' नामक रचना विशेष महत्त्वपूर्ण है और चीन में अक्सर पढ़ी जाती है। उनकी किताबों में 'चित्रांकन करने की विधि' और 'मेरे चित्रों का पाठ' आदि से उनकी चित्रकला का पूरा परिचय मिलता है।

    चीनी प्रजातंत्र के पिता और वर्तमान चीन के जन्मदाता स्वर्गीय डॉक्टर सन यात-सेन से चित्रकार काउ की बड़ी घनिष्ट मित्रता थी। वे काउ में अगाध विश्वास रखते थे। डॉ. सेन के साथ काउ ने भाग्यचक्र के अनेकों उलटफेर देखे हैं। जब सन यात-सेन ने जापान में पहली चीनी क्रांतिकारी सोसाइटी स्थापित की थी, तब उसके सभापति का पद मि० काउ को ही दिया गया था। बाद में वे कैन्टन के चीनी क्रांतिकारी ऐसोसिएशन के सभापति भी चुने गए। वू चंग के युद्ध में काउ महाशय ने तूलिका फेंककर तलवार ग्रहण की, और सेना का संचालन कर विजय प्राप्त की। सैनिक परिस्थिति की दृष्टि से यह विजय ही क्रांतिकारियों के लिए सबसे प्रथम सुविधाजनक विजय थी। शांति स्थापित हो जाने के बाद कैन्टन के अधिकारियों ने काउ को क्वांग-टांग प्रांत का—जहाँ उनका जन्म हुआ था—गवर्नर बनाना चाहा, परंतु उन्होंने इससे इनकार कर दिया और अपनी शक्तियों को रचनात्मक कार्यों में लगाया। उन्होंने नौकरी छूटे हुए सैनिकों को काम दिलाने में सहायता दी और मज़दूरों तथा श्रमिकों के बच्चों के लिए स्कूल खोले। चीन की शिक्षा प्रणाली में जो हेरफेर हुए हैं, जिनसे वह अन्य सभ्य देशों को बराबरी करने योग्य हुई है, उनमें काउ महाशय का बहुत बड़ा हाथ है। उनके समस्त जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षा यही रही है कि चीन—जो पिछड़ी हुई दशा में था—उन्नति करके संसार के अन्य राष्ट्रों में सम्मान का स्थान प्राप्त करे। 

    जब चीन में कुछ और शांति हुई तो मिस्टर काउ ने पुन: अपनी तूलिका और रंग सम्हाले। उन्होंने चीनी चित्रकारों की सुविधा के लिए एक प्रिंटिंग प्रेस खोला और कई सचित्र पत्र—जैसे 'पिंगमैन' और 'चैंग-शैंग' आदि—भी निकाले। उन्होंने एक 'स्टूडियो' भी खोला है, जिसमें चीनी-चित्रकार बिना रोक-टोक के आकर प्रेरणा ग्रहण कर सकें और उनमे सम्मति और सहायता प्राप्त कर सकें।

    काउ महाशय ने अपने चित्रों से संसार में ख्याति प्राप्त की है। उन्हें इटली और पनामा की प्रदर्शनियों में स्वर्ण-पदक मिले थे। बेल्जियम की प्रदर्शनी में जो विशेष पुरस्कार घोषित किया गया था, उसे प्राप्त करने का दुर्लभ सम्मान भी काउ ही को प्राप्त हुआ था। काउ महाशय का स्वभाव बहुत सरल है। वे कभी पैसे के लिए चित्र नहीं बनाते। एक बार एक मंचू राजकुमार ने उनसे कोई चित्र बनवाना चाहा, परंतु उन्होंने इनकार कर दिया; क्योंकि एक तो वे पैसा लेकर अपनी कला नहीं बेचते, दूसरे उनके राजनैतिक विचार मंचू वंश के विरोधी थे।

    काउ महाशय अपने साथ भारतवर्ष में अपने बहुत से चित्र भी लाए हैं, जिन्हें उन्होंने बनारस, कलकत्ता और बम्बई में प्रदर्शनी करके दिखलाया था। बनारस में शिक्षा कांफ्रेंस के धूम-धड़क्के और यूनिवर्सिटी के अपरिपक्क वातावरण में उनके चित्रों की उतनी कद्र नहीं हुई, जितनी होनी चाहिए थी। हाँ, कलकत्ते की ओरिएंटल सोसाइटी के भवन में उनके चित्रों की प्रदर्शनी को बड़ी सफलता मिली। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन बंगाल के सुप्रसिद्ध चित्रकार श्री अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने किया था। कलकत्ते में कला की प्रदर्शनियाँ प्रायः हुआ करती है, परंतु ऐसे कलापूर्ण चित्रों का संग्रह शायद ही कभी देखने में आया हो।

    इस स्थान पर काउ महाशय के चित्रों का कुछ वर्णन अनुपयुक्त न होगा। कलकत्ते में उन्होंने जो चित्र प्रदर्शित किए थे, उनमें कुछ तो प्राचीन चित्र थे, पर अधिकांश श्रीयुत काउ की ही कृतियाँ थीं। चीन और जापान में—विशेषकर जापान में—घरों की सजावट के लिए चित्र टाँगने की एक विशेष परिपाटी है। उनके यहाँ प्रत्येक कमरे में चित्र टाँगने का एक पृथक स्थान नियत होता है। हमारे यहाँ तो शीशे में मढ़ाकर जो तसवीर टाँग दी, वह दस-बीस वर्ष तक ज्यों की त्यों टंगी रहती है, परंतु उनके यहाँ यह बात नहीं है। उनका कथन है कि एक ही तसवीर को अधिक दिन तक निरंतर देखने से उसकी नवीनता जाती रहती है, उसका सौंदर्य और आकर्षण बासी पड़ जाता है। प्रतिदिन देखते-देखते हम अपने अच्छे से अच्छे चित्रों का अस्तित्व तक भूल जाते हैं। इसलिए जापानी लोग—यद्यपि उनके पास दस-पंद्रह चित्र होते हैं—कमरे में केवल एक ही चित्र टाँगते हैं। दस-पंद्रह दिन के बाद वे उस चित्र को उतारकर, हिफ़ाज़त से लपेटकर, ख़ास इसी के लिए बने हुए बाँस के चोंगों में बंद करके रख देते हैं, और उसकी जगह दूसरा चित्र निकालकर टाँग देते हैं। इस प्रकार बराबर बदलते रहने से उनकी दृष्टि में उनके चित्रों का सौंदर्य बासी नहीं होता। हर दसवें-पंद्रहवें दिन उन्हें नवीन चित्र के सौंदर्य का आनंद प्राप्त हुआ करता है। इस पद्धति के कारण चीन और जापान के चित्र अक्सर लपेटने वाले—Roll Picture—चित्र हुआ करते हैं। काउ महाशय के चित्र भी लपेटने वाले चित्र थे। वे या तो रेशम पर बने थे अथवा रेशम पर चिपके हुए थे। इस रेशम के सिरे पर लपेटने के लिए लकड़ी और सींग के ख़ूबसूरत कारीगरी वाले गोल मुठ्ठे लगे हुए थे। आकार में अधिकांश चित्र तीन फीट से पाँच फीट तक लंबे तथा डेढ़ फीट से तीन फीट तक चौड़े थे। 

    काउ महाशय के चित्रों में सबसे पहली बात—जिस पर कि दर्शकों का ध्यान जाता था—थी चित्रों का विषय। कोई लेखक, कवि या चित्रकार जब कोई रचना करने बैठता है, तो उसके सम्मुख जो सबसे बड़ी समस्या खड़ी होती है वह है रचना का विषय। वह किस चीज़ को अपनी कृति का विषय बनावे? किस बात के द्वारा अपनी कला को प्रकट करे? परंतु 'मास्टर' कलाकार को अपनी रचना के लिए विषय—सबजेक्ट—खोजने की आवश्यकता नहीं होती। संसार की कोई भी बात, कोई भी वस्तु उसकी रचना का विषय हो सकती है। साधारण से साधारण बात को भी वह अपनी प्रतिभा से अलौकिक सौंदर्यशाली रूप दे सकता है। नोबेल पुरस्कार विजेता, विख्यात साहित्यक महारथी मॉरिस मैटरलिंक की मशहूर रचनाएँ हैं 'कुत्ता' और 'मधुमक्खी'। काउ महाशय के चित्रों में भी यही बात है। उन्होंने साधारण से साधारण चीज़ों के चित्रों में अपनी प्रतिभा दरसाई है। उनके चित्रों के विषय बंदर, चूहे. मक्खी, मकड़ी, गिद्ध, पुराना मंदिर, झरना, लोमड़ी, नाव, बाघ, कौवे आदि हैं। हमारे जीवन की इन नित्यप्रति की वस्तुओं को भी अंकित करने में उन्होंने कला की पराकाष्ठा दिखा दी है। हम लोगों के हृदय में प्रत्येक चीज़ के लिए जो एक आंतरिक अनुभूति होती है, उसे चित्र-पट पर अंकित कर देना और इस प्रकार अंकित कर देना जो दर्शकों की सहानुभूति को बरबस अपनी ओर खींच ले, कला की उत्कृष्टता है। परंतु इसमें भी एक बात है। कुछ विषय ऐसे हैं, जिनके संबंध में हमारे हृदय में पहले ही से अनेक विचार जमे हुए होते हैं। चालाक कलाकार थोड़ा सा आघात देकर हमारे उन भावों को जाग्रत कर देते हैं। उदाहरण के लिए, हम हिन्दुओं के मन में भगवान कृष्ण के प्रति बचपन से ही विशेष श्रद्धा के भाव जमे रहते हैं। फल यह होता है कि अनेकों ऐरे-ग़ैरे चित्रकार किसी भी ऊट-पटाँग आकृति के सिर में मोरपंख खोंसकर, उसके होठों से लकड़ी का एक टुकड़ा चिपकाकर भगवान कृष्ण का चित्र अंकित कर देते हैं। गीता के उपदेष्टा और भगवान के अवतार योगिराज श्रीकृष्ण की आंतरिक विशेषताएँ उस चित्र से प्रकट होती हैं या नहीं, इससे कोई मतलब नहीं। यहाँ तो मोर-मुकुट और वंशी के बाह्य चिह्नों—Symbols—को देखते ही हमारे हृदय में कृष्ण भगवान के प्रति जमी हुई चिरश्रद्धा के भाव उमड़ आते हैं और हम भक्ति-भाव से गदगद हो, उस चित्र की प्रशंसा करने लगते हैं। उस समय हम यह भी देखने के लिए नहीं रुकते कि चित्र में जो वंशी अंकित की गई है, वह वास्तव में वंशी ही है कि ठोस लकड़ी की एक डंडी! इसे हम सस्ती भावुकता का अनुचित रोज़गार (Exploitation of Cheap sentimentality) कहते हैं, इसीलिए आज दिन भी भारत के बाज़ारों में जर्मनी और ऑस्ट्रिया की छपी हुई ऐसी लाखों तस्वीरों की खपत है, जिनमें गोरी वेश्याओं के चित्रों की वेष-भूषा में थोड़ा सा हेर-फेर करके उन्हें भारतीय देवताओं का रूप दे दिया गया है। परंतु जिन चीजों के लिए हमारे हृदयों में पहले से किसी प्रकार की श्रद्धा या घृणा, अच्छे या बुरे भाव नहीं हैं, उनके प्रति हमारी सहानुभूति को जाग्रत कर देना निस्संदेह कला की बात है। उदाहरण के लिए 'चूहे' को ले लीजिए। चूहे के प्रति हमारे मन में पहले से कोई विशेष बात जमी हुई नहीं है, परंतु चूहे का इस प्रकार का चित्र अंकित करना, जिससे उसके प्रति हमारी समस्त मानव सहानुभूति उमड़ पड़े, बड़ी दक्षता का काम है। काउ महाशय में यह दक्षता पूर्ण मात्रा में विद्यमान है। 

    चीनी चित्रकला बहुत उन्नत कला है। उसके चित्रकार जिस किसी चीज़ को अंकित करते हैं, उसकी मुख्य विशेषता को प्रकट करने का विशेष ध्यान रखते हैं। या यों कहिए कि वे प्रत्येक वस्तुको उसकी एक प्रधान विशेषता के लिए ही अंकित करते हैं। जैसे यदि वे किसी झरने का चित्र अंकित करेंगे, तो उसकी तीव्रता और वेग के लिए, अथवा यदि पहाड़ की तसवीर बनाएँगे, तो उसकी उच्चता के लिए। यही कला की विशेषता है। कैमरे में वह बात नहीं आती। कैमरे से आप पहाड़ का ऐसा चित्र ले सकते हैं, जिसमें उँचाई का नाम भी न हो अथवा झरने की फोटो ऐसे कोण से ली जा सकती है, जिसमें पानी का वेग ही न दीख पड़े। 

    महाशय काउ के अंकित किए हुए 'बाघ' के दो चित्र यहाँ प्रकाशित किए जाते हैं। रंगों की अनुपस्थिति तथा आकार में कमी हो जाने के कारण इन चित्रों में मूल चित्रों के सौंदर्य का पचासवाँ भाग भी मुश्किल से दिखाई पड़ता है। 'बाघ' शब्द कहने से ही हमारे मन में बाघ की हिंस्र प्रवृत्ति, उसका भयावना स्वरूप, उसका क्रोधी स्वभाव, उसका महान बल और साहस  तथा उसकी शाही आन-बान आदि बातें उदय हो आती हैं। 'बाघ' का जो चित्र इन सब बातों को एकदम प्रत्यक्ष नहीं कर देता, वह व्यर्थ है। 'बाघ' का चित्रांकन केवल इन्हीं बातों को प्रकट करने के लिए ही होना चाहिए। नहीं तो कैमरे से हम बाघ की ऐसी भी तसवीर खींच सकते हैं, जिसमें वह केवल एक निरीह कुत्ते के समान ही दिखाई दे।

    'बाघ' के पहले चित्र को देखिए। उसे देखते ही आपको 'बाघ' के हिंस्र स्वभाव का अनुभव होने लगेगा। बाघ एक चट्टान पर खड़ा होकर किसी वस्तु को देखकर दहाड़ रहा है। उसके खड़े होने का ढंग, गर्दन घुमाकर देखने की मुद्रा, गुस्से से खड़ी हुई दुम, विकराल दाँत, खाल की धारियाँ आदि बातें ऐसी ख़ूबी से अंकित की गई हैं, जो देखते ही बनती हैं। मूल चित्र बाघ के स्वाभाविक रंगों में चित्रित किया गया है। चित्र में अंकित चट्टान—जिस पर बाघ खड़ा है—कला की दृष्टि में अपना विशेष  महत्व रखती है। चित्रकार को बाघ को कहीं न कहीं खड़ा ही करना था; मगर चट्टान पर—उँचाई पर—खड़ा करने से चित्र में एक विशेष बल आ गया है। दूसरे चट्टान से बाघ के आकार आदि का अनुमान अपने ही आप हो जाता है। यदि चित्रकार उसे किसी वन-बीहड़ में खड़ा करता, तो पेड़-पत्तों का व्यर्थ आडंबर बढ़ जाता, जिससे केंद्रीय वस्तु की विशेषता में निर्बलता आ जाती। चट्टान में दरारें दिखाकर एक कलापूर्ण सौंदर्य उत्पन्न कर दिया गया है।

    'बाघ' का दूसरा चित्र सफ़ेद और काले रंग में है। इसमें 'बाघ' के हिंस्र भाव के साथ-साथ उसका क्रोधी स्वभाव बड़ी उत्तमता से अंकित है। उसे देखते ही यह भासित होता है कि वह क्रोध से पागल हो रहा है। अंग्रेज़ी का एक कथन है, 'Beauty requires no explanation' (सौंदर्य को समझाने की आवश्यकता नहीं, वह स्वयं ही प्रकट रहता है)। बाघ के इस चित्र पर यह कथन अक्षरशः लागू है। बाघ के क्रोध का विकराल सौंदर्य स्वयं ही प्रत्यक्ष है।

    कौवों का चित्र भी बड़ा सुंदर है। एक कौवा एक बाँस पर बैठा हुआ कोई फल खा रहा है। ऊपर एक दूसरे बाँस पर एक और कौवा उस फल पर नज़र लगाए बैठा है। तीसरा कौवा इस ऊपर वाले कौवे की नीयत बद देखकर ऊपर की ओर चोंच उठाए उसे ललकार रहा है और बाएँ कोने पर बैठे हुए चौथे महाशय चुपके से गर्दन बढ़ाकर इस बात की फ़िराक़ में हैं कि यदि औरों की निगाह चूके तो वे भी फल में एक चोंच मार लें। कौवों की ये सब चेष्टाएँ ऐसी ख़ूबी से और ऐसी प्रत्यक्ष रीति से अंकित की गई हैं कि पहली निगाह डालते ही सब बातें प्रकाश की भाँति स्पष्ट हो जाती है। यहाँ जो चित्र प्रकाशित किया गया है, वह साइज़ में छोटा हो जाने से इतना साफ़ नहीं मालूम पड़ता; मूल चित्र एकदम स्पष्ट है। बाँस बनाकर चित्रकार ने कौवों के बैठने के लिए उपयुक्त स्थान ही नहीं बना दिया, बल्कि कौवों के आकार का अनुपात भी प्रत्यक्ष कर दिया। बाँस में घास का एक पूला भी बँधा हुआ है, जो देहात का स्मरण दिलाता है।

    'मछली का मोह' नामक चित्र में यह दिखलाया गया है कि जल के ऊपर लटकती हुई किसी लता से पानी में एक श्वेत पुष्प झर पड़ा है। बेचारी मछली कोई खाने की चीज़ समझकर उसे गपकने के लिए लपक रही है। मूल चित्र में रंगों के खेल से बड़ा मनोहर सौंदर्य है। मछली इस प्रकार अंकित है, जिससे उसकी व्यग्रता और वेग साफ़-साफ़ प्रकट हो रहे हैं। ऊपर लटकती हुई फूलों से लथी लता बड़ी सुंदरता से दिखाई गई है। चित्रकार ने पानी का किनारा—जहाँ लता या पेड़ लगा हुआ है—नहीं दिखलाया और उसे दिखलाने की आवश्यकता ही नहीं है। काउ महाशय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जानते है कि चित्र को कहाँ ख़तम करना चाहिए। अधिकांश कलाकार—चित्र शिल्पी और साहित्य शिल्पी दोनों ही—अपनी कृति में नितांत आवश्यकता से कही अधिक रचकर, overdo करके उसे बिगाड़ देते हैं।

    काउ महाशय इस दोष से बरी हैं। वे अपनी कृति में जितनी बातें नितांत आवश्यक हैं, उन्हें छोड़कर उनसे एक बिंदु भी अधिक नहीं बनाते। थोड़े में बहुत प्रकट करना साहित्य और चित्रकारी दोनों ही में बड़ा कलापूर्ण काम है। उसे महान दक्षता-प्राप्त उस्ताद ही कर सकते हैं। इसीलिए काउ महाशय के चित्रों में एक प्रकार का गठीलापन है। यदि उनके चित्र में से आप किसी भी छोटी से छोटी चीज़ को हटा दें—या छिपा लें—तो समूचा चित्र ही अधूरा हो जाएगा!

    यहाँ उनका 'मस्तूल और कुहरा' नामक एक और चित्र भी प्रकाशित किया जाता है। प्रातःकाल का समय है, नदी में कुहरा पड़ रहा है। जल में पड़ी हुई नावें कुहरे से बिलकुल ही अस्पष्ट सी हैं। हाँ, उनके ऊँचे मस्तूल घुँधले-धुँधले से दीख पड़ते हैं। नदी के दूसरी ओर सुदूर तट पर एक अस्पष्ट सी इमारत दिखाई पड़ती है। चित्र के ऊर्ध्व भाग के ख़ाली स्थान की शून्यता मिटाने के लिए—अर्थात् चित्र को 'बैलेंस' करने के लिए—चीनी अक्षरों में कुछ इबारत लिख दी गई है।

    मिस्टर काउ के चित्रों में एक बात जो मुझे प्रत्यक्ष मालूम होती थी, वह थी उनकी तूलिका की दृढ़ता। उनका उस्तादी हाथ ऐसी दृढ़ता से चलता हुआ मालूम पड़ता है, जिसमें किसी प्रकार का डर, किसी प्रकार की हिचकिचाहट, किसी तरह की अनिश्चयता नहीं। उनका संसार का अध्ययन बहुत बढ़ा-चढ़ा और कल्पना की उड़ान बहुत ऊँची है। उनके चित्रों को देखकर ऐसा मालूम होता है कि जिस समय वे किसी चीज़ का चित्र अंकित करने के लिए सादा काग़ज़—पट—अपने सामने रखते हैं, उस समय उनके मानस-नेत्रों को उस सादे पट पर उस वस्तु का चित्र अंकित दिखाई देता है। वे केवल तूलिका के दो-चार दृढ़ उस्तादी हाथ फेरकर ही उसे रूपमय बना देते हैं।

    भारतवर्ष में ऐसे महान चित्रकार दो ही एक होंगे। ईश्वर करे, हमारी इस पुण्यभूमि में भी काउ के समान प्रतिभाशाली व्यक्ति उत्पन्न हों।
    स्रोत :
    • पुस्तक : विशाल भारत (पृष्ठ 321)
    • रचनाकार : ब्रजमोहन वर्मा
    • संस्करण : 1931

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